Sunday, August 3, 2014

मेरी आधी अधूरी किताब ................ क्षण प्रतिक्षण


रहबर ही रहजन हो तो रहगुज़र है कहाँ,
रहनुमा बता राहगीर जाएँ तो जाएँ कहाँ । 
......... रजनीश जनवरी १९९२

महफ़िल से "राज" यूँ तेरी रूखसत न होगी आसान,
साजो को अभी नए फ़नकारो से नही हुई है पहचान । 
- रजनीश ६ मई २००८

मंजिल पाने की चाहत "राज" वो करते है, जिनको है सुस्ताना । 
आवारगी हो जिनका जूनून, उन्हें तो  चलते ही है जाना । 

............... रजनीश २ नवम्बर २०१०

नाकामियाँ ही मुक़द्दर में लिखी थी उसके, 
तोड़ा था दम उसने करवट बदल-बदल के,
शायद खुदा भी गमगीन हुआ होगा तब, 
उसने "राज" यह नज़ारा देखा होगा जब । 
............. रजनीश २ अक्टूबर २०११

मेरा साया भी तो मेरा हमसफर न बना,
जब से "राज" उजालों ने मेरा साथ छोड़ा । 

- रजनीश १२ अक्टूबर २०११



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