Thursday, July 31, 2014

आधी अधूरी किताब ……… कुछ क्षड़ ................................. 

(१) 
वफ़ा़ है तो "राज" जफ़ाएँ है,
चाँद है तो उसकी कलाएँ है,
मोहब्बत तो बहती ब़यार है,
अाज मेरी कल तेरी यार है ।
रहते है यहाँ सिर्फ संगदिल,
मिले न यहाँ कोई फाज़ि

…………………………… रजनीश ३१ जुलाई २०१४ 

संगदिल: cold hearted
फाज़िल: virtuous


(२)
ज़बान पर शहद और दिल में रखकर ज़हर,
दोस्त बनकर लोग ढाते है दोस्तों पर क़हर,
हावभाव बता देता है क्या करेगा अब साँप,
आस्तीन साँपों को कैसे पाओगे तुम भाँप ।
मौक़ापरस्त है उगलते है विष पाकर मौक़ा,
फुँकारें न, पर पीठ पीछे देते हैं यह धोखा ।
क़रीब होते है पर मुश्किल है इनकी पहचान,
बेवजह के हितैषियों से सदा रहे सावधान ।

.......................………………… रजनीश ३० जुलाई २०१४ 

(३)
हाथ उठाकर दुआ माँगने से हाथों की लकीरे कभी नही है बदलती,
मगर "राज" सच है कि उन हाथों को सहारे की भी ज़रूरत नहीं होती । 
...............………………………  रजनीश २९ जुलाई २०१४ 

(४)
गिले शिकवे 'राज' है बहुत मुझको भी,
पर कभी दिल पे नहीं लिए मैंने उनको ।
...................……………….............. रजनीश २८ जुलाई २०१४ 

(५)
अपनों पर "राज" हमे हसने की आदत नही है,
उनकी मुस्कराहट देंख हम भी मुस्कारा लेते है ।
...................…………………………… रजनीश २२ जुलाई २०१४ 

आधी अधूरी किताब ……………………………………… कुछ प्रसंग। .............

आज कुछ लिखने का मन हुआ है,
भटकते हुए विचारों का संगम हुआ है । 
खोजा बहुत पर मिल न सका,
काग़ज़ का एक अदद टुकड़ा घर में । 
सोचा चलो अख़बार के एक कोने में,
लिखता हूँ, विचारों को अपने मैं । 
भर गया मन मेरा संदेहों के घेरे मेंं,
देख इबारत ख़ून की अख़वार के पन्नों में । 
सोचा था लिखूँगा, एक ग़ज़ल या गीत,
लजाती हुई गोरी के मीत से मिलन की प्रीति । 
क़लम मेरी हो गई है अब मेरी ही घोर विद्रोही,
चाहती है कि लिखूँ में उस पर जो न हो देशद्रोही । 
पर लिखने के मेरे इरादे अब हो गये हैं स्थगित,
और मन भी मेरा हो गया है व्यथित । 
सोचता हूँ कि,
हम देखते है सिर्फ़ दुसरे के गुनाहों को,
छुपाकर सौ पर्दों मे अपने गुनाहों को । 
...... !!! रजनीश २२ जून २०१४ !!! ......
आधी आधुरी किताब ………………………………………… कुछ प्रसंग

बातों से ही तो बनती है बात,
बाते शब्दों से बने है जज़्बात ।
जो बात दे दिल को सुकूनात,
वही दिल में करें नश्तर सी घात ।
कभी बातों में बात होती है,
और कभी आप में बात होती है ।
बातों ही बातों में होते है झगड़े,
बातों से ही दूर होते है सब रगड़े ।
बाते तरकश से निकले तीर है,
मन में घर कर जाए वे पीर है ।
बातों ही बातों में बन जाए हस्ती,
गिरते है हम करके बातें सस्ती ।
बातों के भावों को है जिसने साधा,
उस हस्ती को न पहुँचे कोई बाधा ।
बाते और मन का रिश्ता अभिन्न है,
जैसे जल से तरंगे कभी न भिन्न है ।
हानि वृद्धि बीज बातों में है निहित,
बातों से ही चरित्र होता है विदित ।
हृदय में हो प्रेम, सद्भावना व ज्ञान,
अहंकार हो न यह बात तू ले जान ।
आयेगा यह हमें निरंतर अभ्यास से,
बातें होंगी सत्य मधुर प्रिय प्रयास से । 

........ रजनीश १७ जुलाई २०१४ 
आधी अधूरी किताब ………………………………………… कुछ प्रसंग 


हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।
हमारा गाम क्या था, एक पूरा मौल था,
वहाँ एक चौपाल, भांड और एक बड़ा ढोल था ।
पेड़ों की शाखों पर झूले पड़ते थे,
लहलहाते खेतों को देख हम सब ग़म भूले थे ।
गाम में नाई, खाती, लुहार, बनिया था,
उनका हर काम ज़रूरत मुताबिक़ बढ़िया था ।
छोटे छोटे घर में रहने वाले दिलदार थे,
सब एक दूसरे के घर के पहरेदार थे ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

कित्ता भी खालों, पर हर घर मे भोजऩ तैयार था,
भूखा कभी भूखा न लौटे, ऐसा व्यवहार था ।
ढयोड़ी पे सबके होती थी घिया तौरी,
कभी न की थी हमने सब्ज़ी वाले की चिरौरी ।
शाही पनीर में भी वह स्वाद है कहाँ मिलता,
जो शुद्ध ताज़े दूध दही बुरा में था मिलता ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

झटपट दलिया के आगे मैगी मकरोनी बेकार थे,
शहतूत, अमरूद्द और निम्बोली सदाबहार थे ।
मिट्टी देह पर मल तालाब में नहा लेते थे,
जिसके आगे साबुन और स्वीमिंग पूल बेकार थे ।
कबड्डी गुल्ली डंडा हमारे घने चोखे खेल थे,
जब जहाँ चाहा तब हम डंड पेलते थे ।
गाम में कौन सा क्रिकेट का ख़ुमार था,
जिम से हमको कौन सा दरकार था ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

चौपाल पर गाम देश की ख़बरों का भँडार था,
गाम में कौन सा टेलिविॹन और अख़वार था ।
पंडितजी और नाई शादी ब्याह करा देते थे,
ऊंचनीच होने पर बीच बचाव करा देते थे ।
भाई भाई साथ खड़े थे सबमें घना प्यार था,
दो बर्तन जैसे खड़के उतना ही तकरार था ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

वो प्यार और रिश्तों की सौंधी ख़ुश्बू कहाँ से लाऊँ,
यह सोच सोच कर दिल की पीड़ा को कहाँ ले जाऊ ।
पर सोचता हूँ कि नदी कब कहाँ ठहरी है,
बदबू न आये इसलिए इसका बहना ज़रूरी है ।
आचार विचार संस्कृति मे भी बदलाव ज़रूरी है,
पर उनमें बसी ख़ुशबू को समेटना क्यों ज़रूरी है ।
मेरे दिल से दूर नहीं होती है यह बेक़रारी,
पर वो गाम है कहाँ, जिसकी याद में हमने शामें है गुज़ारी ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

............ रजनीश ........ २७ जुलाई २०१४ 
आधी अधूरी किताब .............................................. 


मंजिल आसमा न होती तो हमने भी ज़िंदगी आसा गुजारी होती ...रजनीश ५ जून १९९० 

ज़िंदगी के सफ़र में आयेंगे कई बार मेले,
तमाशबीनों की भीड़ में हर बार हम होंगे अकेले | © रजनीश