आधी अधूरी किताब ……… कुछ क्षड़ .................................
(१)वफ़ा़ है तो "राज" जफ़ाएँ है,
चाँद है तो उसकी कलाएँ है,
मोहब्बत तो बहती ब़यार है,
अाज मेरी कल तेरी यार है ।
रहते है यहाँ सिर्फ संगदिल,
मिले न यहाँ कोई फाज़ि
…………………………… रजनीश ३१ जुलाई २०१४
संगदिल: cold hearted
फाज़िल: virtuous
(२)
ज़बान पर शहद और दिल में रखकर ज़हर,
दोस्त बनकर लोग ढाते है दोस्तों पर क़हर,
हावभाव बता देता है क्या करेगा अब साँप,
आस्तीन साँपों को कैसे पाओगे तुम भाँप ।
मौक़ापरस्त है उगलते है विष पाकर मौक़ा,
फुँकारें न, पर पीठ पीछे देते हैं यह धोखा ।
क़रीब होते है पर मुश्किल है इनकी पहचान,
बेवजह के हितैषियों से सदा रहे सावधान ।
.......................………………… रजनीश ३० जुलाई २०१४
(३)
हाथ उठाकर दुआ माँगने से हाथों की लकीरे कभी नही है बदलती,
मगर "राज" सच है कि उन हाथों को सहारे की भी ज़रूरत नहीं होती ।
...............……………………… रजनीश २९ जुलाई २०१४
(४)
गिले शिकवे 'राज' है बहुत मुझको भी,
पर कभी दिल पे नहीं लिए मैंने उनको ।
पर कभी दिल पे नहीं लिए मैंने उनको ।
...................……………….............. रजनीश २८ जुलाई २०१४
(५)
अपनों पर "राज" हमे हसने की आदत नही है,
उनकी मुस्कराहट देंख हम भी मुस्कारा लेते है ।