Thursday, July 31, 2014

आधी अधूरी किताब ………………………………………… कुछ प्रसंग 


हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।
हमारा गाम क्या था, एक पूरा मौल था,
वहाँ एक चौपाल, भांड और एक बड़ा ढोल था ।
पेड़ों की शाखों पर झूले पड़ते थे,
लहलहाते खेतों को देख हम सब ग़म भूले थे ।
गाम में नाई, खाती, लुहार, बनिया था,
उनका हर काम ज़रूरत मुताबिक़ बढ़िया था ।
छोटे छोटे घर में रहने वाले दिलदार थे,
सब एक दूसरे के घर के पहरेदार थे ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

कित्ता भी खालों, पर हर घर मे भोजऩ तैयार था,
भूखा कभी भूखा न लौटे, ऐसा व्यवहार था ।
ढयोड़ी पे सबके होती थी घिया तौरी,
कभी न की थी हमने सब्ज़ी वाले की चिरौरी ।
शाही पनीर में भी वह स्वाद है कहाँ मिलता,
जो शुद्ध ताज़े दूध दही बुरा में था मिलता ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

झटपट दलिया के आगे मैगी मकरोनी बेकार थे,
शहतूत, अमरूद्द और निम्बोली सदाबहार थे ।
मिट्टी देह पर मल तालाब में नहा लेते थे,
जिसके आगे साबुन और स्वीमिंग पूल बेकार थे ।
कबड्डी गुल्ली डंडा हमारे घने चोखे खेल थे,
जब जहाँ चाहा तब हम डंड पेलते थे ।
गाम में कौन सा क्रिकेट का ख़ुमार था,
जिम से हमको कौन सा दरकार था ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

चौपाल पर गाम देश की ख़बरों का भँडार था,
गाम में कौन सा टेलिविॹन और अख़वार था ।
पंडितजी और नाई शादी ब्याह करा देते थे,
ऊंचनीच होने पर बीच बचाव करा देते थे ।
भाई भाई साथ खड़े थे सबमें घना प्यार था,
दो बर्तन जैसे खड़के उतना ही तकरार था ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

वो प्यार और रिश्तों की सौंधी ख़ुश्बू कहाँ से लाऊँ,
यह सोच सोच कर दिल की पीड़ा को कहाँ ले जाऊ ।
पर सोचता हूँ कि नदी कब कहाँ ठहरी है,
बदबू न आये इसलिए इसका बहना ज़रूरी है ।
आचार विचार संस्कृति मे भी बदलाव ज़रूरी है,
पर उनमें बसी ख़ुशबू को समेटना क्यों ज़रूरी है ।
मेरे दिल से दूर नहीं होती है यह बेक़रारी,
पर वो गाम है कहाँ, जिसकी याद में हमने शामें है गुज़ारी ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

............ रजनीश ........ २७ जुलाई २०१४ 

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