Thursday, July 31, 2014

आधी अधूरी किताब .............................................. 


मंजिल आसमा न होती तो हमने भी ज़िंदगी आसा गुजारी होती ...रजनीश ५ जून १९९० 

ज़िंदगी के सफ़र में आयेंगे कई बार मेले,
तमाशबीनों की भीड़ में हर बार हम होंगे अकेले | © रजनीश

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