आधी अधूरी किताब ..............................................
मंजिल आसमा न होती तो हमने भी ज़िंदगी आसा गुजारी होती ...रजनीश ५ जून १९९०
ज़िंदगी के सफ़र में आयेंगे कई बार मेले,
तमाशबीनों की भीड़ में हर बार हम होंगे अकेले | © रजनीश
मंजिल आसमा न होती तो हमने भी ज़िंदगी आसा गुजारी होती ...रजनीश ५ जून १९९०
ज़िंदगी के सफ़र में आयेंगे कई बार मेले,
तमाशबीनों की भीड़ में हर बार हम होंगे अकेले | © रजनीश
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