आधी अधूरी किताब ……………………………………… कुछ प्रसंग। .............
आज कुछ लिखने का मन हुआ है,
आज कुछ लिखने का मन हुआ है,
भटकते हुए विचारों का संगम हुआ है ।
खोजा बहुत पर मिल न सका,
काग़ज़ का एक अदद टुकड़ा घर में ।
सोचा चलो अख़बार के एक कोने में,
लिखता हूँ, विचारों को अपने मैं ।
भर गया मन मेरा संदेहों के घेरे मेंं,
देख इबारत ख़ून की अख़वार के पन्नों में ।
सोचा था लिखूँगा, एक ग़ज़ल या गीत,
लजाती हुई गोरी के मीत से मिलन की प्रीति ।
क़लम मेरी हो गई है अब मेरी ही घोर विद्रोही,
चाहती है कि लिखूँ में उस पर जो न हो देशद्रोही ।
पर लिखने के मेरे इरादे अब हो गये हैं स्थगित,
और मन भी मेरा हो गया है व्यथित ।
सोचता हूँ कि,
हम देखते है सिर्फ़ दुसरे के गुनाहों को,
छुपाकर सौ पर्दों मे अपने गुनाहों को ।
...... !!! रजनीश २२ जून २०१४ !!! ......
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