Thursday, July 31, 2014

आधी अधूरी किताब ……………………………………… कुछ प्रसंग। .............

आज कुछ लिखने का मन हुआ है,
भटकते हुए विचारों का संगम हुआ है । 
खोजा बहुत पर मिल न सका,
काग़ज़ का एक अदद टुकड़ा घर में । 
सोचा चलो अख़बार के एक कोने में,
लिखता हूँ, विचारों को अपने मैं । 
भर गया मन मेरा संदेहों के घेरे मेंं,
देख इबारत ख़ून की अख़वार के पन्नों में । 
सोचा था लिखूँगा, एक ग़ज़ल या गीत,
लजाती हुई गोरी के मीत से मिलन की प्रीति । 
क़लम मेरी हो गई है अब मेरी ही घोर विद्रोही,
चाहती है कि लिखूँ में उस पर जो न हो देशद्रोही । 
पर लिखने के मेरे इरादे अब हो गये हैं स्थगित,
और मन भी मेरा हो गया है व्यथित । 
सोचता हूँ कि,
हम देखते है सिर्फ़ दुसरे के गुनाहों को,
छुपाकर सौ पर्दों मे अपने गुनाहों को । 
...... !!! रजनीश २२ जून २०१४ !!! ......

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