Tuesday, May 28, 2019

#पक्का_सच

शब्दों को मोक्ष नही मिलता,
वो बहते हैं शाश्वत भाव से,
इनको अग्नि नहीं जला सकती,
ना ही समुद्र खुद में समेट सकता है,
यह तो फैलते हैं जंगली बेल की तरह,
भावनाओं की उर्वरता पाकर खिलते हैं,
कभी कविता से नम, कभी लेख से परिपक्व,
कभी उत्तेजित, उग्र, हिंसक, कभी निर्मल सी स्मित
दिल की धरती पर, अश्रु का जल लेकर, 
यह अवरुद्ध नही मरू से और ना ही चट्टानों से,
आशाएँ निराशाओं के झूले में झूलते रहते हैं,
अस्तित्व जख्मी होने पर भी ये जीवित रहते हैं,
यह नश्वर हैं, मिट नहीं सकते,
एक वरदान कभी, कभी अभिशप्त भी,
बदलते हैं अपनी काया के साथ साथ आत्मा को,
ये साक्षी हैं सदियों से सृजन के विनाश के,
स्थायित्व के और परिवर्तन के,
कभी उपस्थित हैं अनुभुतियों के घने अंधेरों में 
कभी गुम हैं कठिन परिस्थितियों में,
यह मोक्ष के हकदार नहीं और इच्छित भी नही,
भोग रहे हैं अमरतव के श्राप को और
जीते हैं अश्वत्थामा को क्योंकि 
मृत्यु इन्हें लब्ध नहीं। 
#रजनीश

8 comments:

  1. So beautifully expressed. Lovely.

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  2. ईश्वर से प्राप्त उपहार मानव को । खुद को अभिव्यक्त करने की ।

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  3. शानदार अभिव्यक्ति 👌

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  4. आध्यात्मिक अभिव्यक्ति।

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  5. सुप्रभात भैया , बहुत बहुत शुभकामनाएं ब्लॉग शुरुआत करने के लिए ।

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  6. Respected sir many congratulations for starting your own blog.. gone through your poem... Very beautifully you have expressed about the eternity through your poem.

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