Sunday, September 7, 2014

नेताजी का कविता पाठ

नेताजी का कविता पाठ:

तकदीर में जिसकी जो लिखा है वही मिलेगा,
जिसके पास बहुमत हैं, कुर्सी का सुख भोगेगा ।
कुछ मेरी ख्वाब औ तमन्नाओं को पूरा होने दो,
जो सांसद तुम्हारे पास है, मेरी सूची में आने दो ।

तेरे पांच मंत्री बनाना का है मेरा पक्का वादा,
नहीं तो ४०० खोके हमारा पहले से ही है सौदा ।
मेरी बात तो तुझको माननी ही पड़ेगी, वरना,
दूसरी पार्टी सीबीआई से तेरी खाल खिचवालेगी ।

बहुत कोशिश करता हूँ तेरी (कुर्सी) याद भुलाने की,
कोई कोशिश न करे मेरे सांसदों को बरगलाने की ।
भुला देने में मेरी कारगुजारियों को क्या जाता है तेरा (जनता), वरना,
सड़क से संसद में दंगे करा दूंगा, गर चरित्र हनन किया मेरा ।
........ रजनीश

Monday, September 1, 2014

दोहे व्यंग् : जी ले दुशवारियों संग

दोहे (व्यंग्) : जी ले दुशवारियों के साथ
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दोस्त कभी ना बोले झूठ, तू ही नर ठहरा मूर्ख ।
कह गये सब नर नारी, फँसा तू देख गाल सूर्ख ।।१।।

अब पछताये का होत है, जब चिड़िया चुग गई खेत ।
शादी कर गँवाई आज़ादी जैसे मुठ्ठी से फिसली रेत ।।२।।

तरूवर कभी फल नहिं खात है, नाहीं सरोवर पियहि पान ।
कहि "राज" पत्नी शौक हित, संपति सँचहि करें पति नाम ।।३।।

"राज" पति-पत्नी होते है, एक ही सिक्के के दो हिस्से ।
नाही देंखे एक-दूसरे का मुंह, एेसे मशहूर हैं इनके क़िस्से ।।४।।

पत्नी चाहे क्या, लाख करें जाने ना कोए ।
"राज" बिगरे दूध को, मथे ना माखन होय ।।५।।

"राज" है कहते जाते, भक्तों बाँध लो कसकर गाँठ ।
पत्नी वहीं श्रेष्ठ, करे जो स्वगलती पर पति को माफ़ ।।६।।

क्षमा पति को करन चाहिये, पत्नी को उत्पात ।
कहि "राज" पति का घट्यौ, जो पत्नी मारी लात ।।७।।

दिलों में ना बसे खुदा, सिर्फ़ बसता है शैतान ।
कर शादी "राज" और ना रह तू भी अनजान ।।८।।

"राज" वो नारियां मर गई जो पति पर करें विश्वास ।
बन ना सकी पत्नी, जो पढ़ ले मर्द के पीड़ा भरे एहसास ।। ९।।

फ़िक्र ना करो "राज", कर लो बेधड़क शादी पाने को लाभ ।
अच्छी पत्नी दे सुख, बुरी हो तो ज़िंदगी में दे प्रभु आभ ।।१०।।

"राज" आतंकवादी ही भले, जो थोड़े दिन में पकड़े जाए ।
बता कोई भाग्यशाली, जो ता ज़िंदगी पत्नी से बच पाए ।।११।।

ना कर घमंड "राज" तू अपनी अाजादी पर ।
ना हो तुझे विश्वास तो एकबार देख शादी कर ।।१२।।

दोहे (व्यंग्) : जी ले दुशवारियों के साथ - भाग २
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वे "राज" नर धन्य धान्य है, पर उपकारी अंग ।
पत्नी ग़लती को मान अपना, जीवन यापन करें संग ।।१३।।

हर पल में सुमिरन करो, पत्नी नाम को हे "राज" तुम,
भूत पिशाच निकट ना आवे, पत्नी भी ख़ुश रहे हर दम ।।१४।।

जो "राज" गति दीप की, धर्मपत्नी गति सोय ।
शुरू मे उजियारो लगे, बाद में अँधेरो होय ।।१५।।

जो "राज" चलन को चले, बालू चलने न दे कोय ।
पत्नी कहे करो महान कारज, पर ख़ुद करने ना दे कोय ।।१६।।

बाँधे ना किसान मेढ़, बारिश होय तो फ़सल की बरबादी ।
सुने ना जो दिमाग़ की, "राज" शादी कर खोए वो आज़ादी ।।१७।।

देख बाती पतंगा जल मर जाए, छोड़ अंधियार रोशनी भाए ।
"राज" जो कोए सूरत ना जाए, जीवन आज़ाद हो वो बिताए ।।१८।।

देख जलेबी मक्खियाँ भिनभिनाए, चासनी में डूब वो जान गँवाए ।
"राज" जो नारी की सूरत भाए, जान लो आपन पैर कुल्हाड़ी जमाए ।।१९।।

"राज" मकड़ माहिर होवे बुनने में घनों मकड़जाल,
पत्नी की मक्कड़चालों से कोय बचे ना होए से घायल ।।२०।।

चुप सहन सुख शान्ति देए, बहस मनस्वी को शोभा नाहीं,
"राज़" आपन गलती मान लेए, पर ग़लती कुछ बोले नाहीं ।।२१।।

बाढ़न में बाँध टूटे जाए, अधिक जल सरोवर में ना समाए ।
ताने दे "राज" पहने को कछु नाए, रखे को अलमारियां कम पड़ जाए ।।२२।।

कह गये दास "राज", करले जी भरकर तू मनमानी,
होते ही शादी, सहने पड़ेगी तुझे पत्नी की मनमानी ।।२३।।

बानी ऐसी बोले पत्नी, जो मन का आपा खोए ।
पत्नी शब्दबाण से "राज", शान्तचित ही बचाए ।।२४।।

क्यूँकर "राज" तू अपने ज्ञान पर इतना इतराए ।
तू बोले सिर्फ़ शब्द, पत्नी कुछ पृष्ठ सुनाए जाए ।।२५।।

"राज" बड़े बुढ़े कह गए, इश्क़ और मुश्क कोई ना छुपा पाए ।
उन्हें नहीं मालूम मुश्क ही तो सब लफड़ों की जड़ बन जाए ।।२६।।

....... रजनीश ३० अगस्त २०१४
समाप्त






Sunday, August 3, 2014

मेरी आधी अधूरी किताब ................ क्षण प्रतिक्षण


रहबर ही रहजन हो तो रहगुज़र है कहाँ,
रहनुमा बता राहगीर जाएँ तो जाएँ कहाँ । 
......... रजनीश जनवरी १९९२

महफ़िल से "राज" यूँ तेरी रूखसत न होगी आसान,
साजो को अभी नए फ़नकारो से नही हुई है पहचान । 
- रजनीश ६ मई २००८

मंजिल पाने की चाहत "राज" वो करते है, जिनको है सुस्ताना । 
आवारगी हो जिनका जूनून, उन्हें तो  चलते ही है जाना । 

............... रजनीश २ नवम्बर २०१०

नाकामियाँ ही मुक़द्दर में लिखी थी उसके, 
तोड़ा था दम उसने करवट बदल-बदल के,
शायद खुदा भी गमगीन हुआ होगा तब, 
उसने "राज" यह नज़ारा देखा होगा जब । 
............. रजनीश २ अक्टूबर २०११

मेरा साया भी तो मेरा हमसफर न बना,
जब से "राज" उजालों ने मेरा साथ छोड़ा । 

- रजनीश १२ अक्टूबर २०११



Thursday, July 31, 2014

आधी अधूरी किताब ……… कुछ क्षड़ ................................. 

(१) 
वफ़ा़ है तो "राज" जफ़ाएँ है,
चाँद है तो उसकी कलाएँ है,
मोहब्बत तो बहती ब़यार है,
अाज मेरी कल तेरी यार है ।
रहते है यहाँ सिर्फ संगदिल,
मिले न यहाँ कोई फाज़ि

…………………………… रजनीश ३१ जुलाई २०१४ 

संगदिल: cold hearted
फाज़िल: virtuous


(२)
ज़बान पर शहद और दिल में रखकर ज़हर,
दोस्त बनकर लोग ढाते है दोस्तों पर क़हर,
हावभाव बता देता है क्या करेगा अब साँप,
आस्तीन साँपों को कैसे पाओगे तुम भाँप ।
मौक़ापरस्त है उगलते है विष पाकर मौक़ा,
फुँकारें न, पर पीठ पीछे देते हैं यह धोखा ।
क़रीब होते है पर मुश्किल है इनकी पहचान,
बेवजह के हितैषियों से सदा रहे सावधान ।

.......................………………… रजनीश ३० जुलाई २०१४ 

(३)
हाथ उठाकर दुआ माँगने से हाथों की लकीरे कभी नही है बदलती,
मगर "राज" सच है कि उन हाथों को सहारे की भी ज़रूरत नहीं होती । 
...............………………………  रजनीश २९ जुलाई २०१४ 

(४)
गिले शिकवे 'राज' है बहुत मुझको भी,
पर कभी दिल पे नहीं लिए मैंने उनको ।
...................……………….............. रजनीश २८ जुलाई २०१४ 

(५)
अपनों पर "राज" हमे हसने की आदत नही है,
उनकी मुस्कराहट देंख हम भी मुस्कारा लेते है ।
...................…………………………… रजनीश २२ जुलाई २०१४ 

आधी अधूरी किताब ……………………………………… कुछ प्रसंग। .............

आज कुछ लिखने का मन हुआ है,
भटकते हुए विचारों का संगम हुआ है । 
खोजा बहुत पर मिल न सका,
काग़ज़ का एक अदद टुकड़ा घर में । 
सोचा चलो अख़बार के एक कोने में,
लिखता हूँ, विचारों को अपने मैं । 
भर गया मन मेरा संदेहों के घेरे मेंं,
देख इबारत ख़ून की अख़वार के पन्नों में । 
सोचा था लिखूँगा, एक ग़ज़ल या गीत,
लजाती हुई गोरी के मीत से मिलन की प्रीति । 
क़लम मेरी हो गई है अब मेरी ही घोर विद्रोही,
चाहती है कि लिखूँ में उस पर जो न हो देशद्रोही । 
पर लिखने के मेरे इरादे अब हो गये हैं स्थगित,
और मन भी मेरा हो गया है व्यथित । 
सोचता हूँ कि,
हम देखते है सिर्फ़ दुसरे के गुनाहों को,
छुपाकर सौ पर्दों मे अपने गुनाहों को । 
...... !!! रजनीश २२ जून २०१४ !!! ......
आधी आधुरी किताब ………………………………………… कुछ प्रसंग

बातों से ही तो बनती है बात,
बाते शब्दों से बने है जज़्बात ।
जो बात दे दिल को सुकूनात,
वही दिल में करें नश्तर सी घात ।
कभी बातों में बात होती है,
और कभी आप में बात होती है ।
बातों ही बातों में होते है झगड़े,
बातों से ही दूर होते है सब रगड़े ।
बाते तरकश से निकले तीर है,
मन में घर कर जाए वे पीर है ।
बातों ही बातों में बन जाए हस्ती,
गिरते है हम करके बातें सस्ती ।
बातों के भावों को है जिसने साधा,
उस हस्ती को न पहुँचे कोई बाधा ।
बाते और मन का रिश्ता अभिन्न है,
जैसे जल से तरंगे कभी न भिन्न है ।
हानि वृद्धि बीज बातों में है निहित,
बातों से ही चरित्र होता है विदित ।
हृदय में हो प्रेम, सद्भावना व ज्ञान,
अहंकार हो न यह बात तू ले जान ।
आयेगा यह हमें निरंतर अभ्यास से,
बातें होंगी सत्य मधुर प्रिय प्रयास से । 

........ रजनीश १७ जुलाई २०१४ 
आधी अधूरी किताब ………………………………………… कुछ प्रसंग 


हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।
हमारा गाम क्या था, एक पूरा मौल था,
वहाँ एक चौपाल, भांड और एक बड़ा ढोल था ।
पेड़ों की शाखों पर झूले पड़ते थे,
लहलहाते खेतों को देख हम सब ग़म भूले थे ।
गाम में नाई, खाती, लुहार, बनिया था,
उनका हर काम ज़रूरत मुताबिक़ बढ़िया था ।
छोटे छोटे घर में रहने वाले दिलदार थे,
सब एक दूसरे के घर के पहरेदार थे ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

कित्ता भी खालों, पर हर घर मे भोजऩ तैयार था,
भूखा कभी भूखा न लौटे, ऐसा व्यवहार था ।
ढयोड़ी पे सबके होती थी घिया तौरी,
कभी न की थी हमने सब्ज़ी वाले की चिरौरी ।
शाही पनीर में भी वह स्वाद है कहाँ मिलता,
जो शुद्ध ताज़े दूध दही बुरा में था मिलता ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

झटपट दलिया के आगे मैगी मकरोनी बेकार थे,
शहतूत, अमरूद्द और निम्बोली सदाबहार थे ।
मिट्टी देह पर मल तालाब में नहा लेते थे,
जिसके आगे साबुन और स्वीमिंग पूल बेकार थे ।
कबड्डी गुल्ली डंडा हमारे घने चोखे खेल थे,
जब जहाँ चाहा तब हम डंड पेलते थे ।
गाम में कौन सा क्रिकेट का ख़ुमार था,
जिम से हमको कौन सा दरकार था ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

चौपाल पर गाम देश की ख़बरों का भँडार था,
गाम में कौन सा टेलिविॹन और अख़वार था ।
पंडितजी और नाई शादी ब्याह करा देते थे,
ऊंचनीच होने पर बीच बचाव करा देते थे ।
भाई भाई साथ खड़े थे सबमें घना प्यार था,
दो बर्तन जैसे खड़के उतना ही तकरार था ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

वो प्यार और रिश्तों की सौंधी ख़ुश्बू कहाँ से लाऊँ,
यह सोच सोच कर दिल की पीड़ा को कहाँ ले जाऊ ।
पर सोचता हूँ कि नदी कब कहाँ ठहरी है,
बदबू न आये इसलिए इसका बहना ज़रूरी है ।
आचार विचार संस्कृति मे भी बदलाव ज़रूरी है,
पर उनमें बसी ख़ुशबू को समेटना क्यों ज़रूरी है ।
मेरे दिल से दूर नहीं होती है यह बेक़रारी,
पर वो गाम है कहाँ, जिसकी याद में हमने शामें है गुज़ारी ।
हम भूला न पाये है अपने गाम को,
अबहीं तक न समझे है, शहरी ताम झाम को ।

............ रजनीश ........ २७ जुलाई २०१४ 
आधी अधूरी किताब .............................................. 


मंजिल आसमा न होती तो हमने भी ज़िंदगी आसा गुजारी होती ...रजनीश ५ जून १९९० 

ज़िंदगी के सफ़र में आयेंगे कई बार मेले,
तमाशबीनों की भीड़ में हर बार हम होंगे अकेले | © रजनीश