Wednesday, May 29, 2019

अनकही_स्मृतियाँ

जानते हो एहसास क्या है
कभी पनघट पे होते सूर्योदय में 
दरिया को सुनहला और रूपहला गोटा
लगाकर श्रंगार करते देखना
कभी कुछ देर खामोशी से 
दूर दरख्त की छांव से 
सरि को भाप का दुपट्टा ओढ़े सोते देख
श्रांत पथिक की गहन निद्रा महसूस करना
कभी नीले कल कल जल में
डूबती शाम के साथ
तट पर टकराती लहरों के आंचल में
स्वंय को अविरल बहने देना 
या पूर्ण रजनीश को रजनी में देख
समुद्र का उन्मादित होना 
और हौले से लहरों का 
तुम्हारे मन मानस से अठखेलियां करना
हाँ शायद इन्ही पलों में कैद होकर
समेटे हुए कुछ मुक्ति भरे क्षणों में
फिर न रहे कोई इच्छा और अभिलाषा
हाँ, यही तो एहसास है जो मुझे तृप्त करता है। 
                                                   ...रजनीश

7 comments:

  1. Awesome.बधाई हो सर एक नयी शुरुआत की

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  2. शब्द नही बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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  3. शब्द नही बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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  4. शब्द नही बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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