जानते हो एहसास क्या है
कभी पनघट पे होते सूर्योदय में
दरिया को सुनहला और रूपहला गोटा
लगाकर श्रंगार करते देखना
कभी कुछ देर खामोशी से
दूर दरख्त की छांव से
सरि को भाप का दुपट्टा ओढ़े सोते देख
श्रांत पथिक की गहन निद्रा महसूस करना
कभी नीले कल कल जल में
डूबती शाम के साथ
तट पर टकराती लहरों के आंचल में
स्वंय को अविरल बहने देना
या पूर्ण रजनीश को रजनी में देख
समुद्र का उन्मादित होना
और हौले से लहरों का
तुम्हारे मन मानस से अठखेलियां करना
हाँ शायद इन्ही पलों में कैद होकर
समेटे हुए कुछ मुक्ति भरे क्षणों में
फिर न रहे कोई इच्छा और अभिलाषा
हाँ, यही तो एहसास है जो मुझे तृप्त करता है।
...रजनीश
कभी पनघट पे होते सूर्योदय में
दरिया को सुनहला और रूपहला गोटा
लगाकर श्रंगार करते देखना
कभी कुछ देर खामोशी से
दूर दरख्त की छांव से
सरि को भाप का दुपट्टा ओढ़े सोते देख
श्रांत पथिक की गहन निद्रा महसूस करना
कभी नीले कल कल जल में
डूबती शाम के साथ
तट पर टकराती लहरों के आंचल में
स्वंय को अविरल बहने देना
या पूर्ण रजनीश को रजनी में देख
समुद्र का उन्मादित होना
और हौले से लहरों का
तुम्हारे मन मानस से अठखेलियां करना
हाँ शायद इन्ही पलों में कैद होकर
समेटे हुए कुछ मुक्ति भरे क्षणों में
फिर न रहे कोई इच्छा और अभिलाषा
हाँ, यही तो एहसास है जो मुझे तृप्त करता है।
...रजनीश
Very nice 👌
ReplyDeleteबहुत खूब।
ReplyDeleteKya baat
ReplyDeleteAwesome.बधाई हो सर एक नयी शुरुआत की
ReplyDeleteशब्द नही बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
ReplyDeleteशब्द नही बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
ReplyDeleteशब्द नही बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
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