Sunday, July 7, 2019

#अनकही_स्मृतियाँ


कुछ उड़ी उड़ी कुछ खोई खोई सी है ये धूल,
चाँद के आँचल को पाने की इसने की है भूल,
भूली है ये रास्ते जो जाते हैं इस के जहां को
मजबूर है बेगानों के शहर में पनाह पाने को।

हो के अब मैं तुम से हमजुदा, जीता हूँ मैं पाने को इनायते खुदा,
जलसे तेरे शरीक थी कायनात, एक था बदनसीब गवाहे वाक्यात।

संवरती हुई मेरी इस जिन्दगी में फिर से एक हलचल हुई है,
पैगाम भेजकर तुमने ख़त में मेरी सलामती की जो खबर ली है।

आसमां छूने की तमन्नाएँ जमीं से दूर तुमको हैं ले आई,
फ़ैले हुए आसमां की हदों से, तेरे जहां में पसरी तन्हाई।

थी तू मेरी जद से कहीं दूर बनके किसी और की आँखों का नूर,
भेजके पैगाम ये सितम किया ताउम्र हमको इंतज़ार का जख्म दिया।

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