Monday, July 1, 2019

#अनकही_स्मृतियाँ

अब हूँ मैं तेरी बेरुखी से बेखबर,
तू जा बसी है मेरी रूह औ जिस्म में इस कदर,
तेरा मेरा साथ फसाना है या सदाकत,
तेरी हर शरारत है गोआ खुदा की एक इनायत। 

दिल में एक अजीब सी हरकत है, 
उनसे मिलने की हरपल हसरत है,
दूर होकर भी बहुत पास होते है वो हमारे, 
गोआ चाँद के आँचल में छिपे हो हज़ारों सितारे। 

नगमे प्यार के गुनगुनाते है हम, और 
काफिलों के मंज़र से कतराते है हम,
इश्क परस्तिश है मजहब अब मेरा,
मौकतल में तू ही तो रहबर है मेरा। 

लबरेज़ है शराबे इश्क हमारा जाम,
आलमे बेखुदी में पढ़ते है सिर्फ तेरा कलाम,
अब हम यूँ ही हो चले है बदनाम,
महफ़िलों हमारी चर्चाएे इश्क है सरेआम।

और शाम फिर से ढलने लगी,
तेरी कमी दिल को खलने लगी,
ये पैगाम फ़िजा में कैसा बहता है,
डूबते दिल को साहिल लगता है

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