हसीन ख्वाबों का घरौंदा बनाता रहा मैं, और
नादानी में उसके तले तेरे आरमनों को रोंदता रहा
छोड़ा था तूने मासूमियत भरा एक पैगाम मेरे नाम
इल्म न था कि ये ज़माना कर देगा हमको बदनाम।
रेज़ा रेज़ा होकर ख्वाब टूटने लगे हैं
जब से वो हम से दूर होने लगे हैं,
गज़ब का है यह अंदाज़ रुसवाई का,
गिरा हिज़ाब देते है पैगाम ज़ुदाई का।
गर है कोई कहता मुझको, सफ़र ये भाता ना मुझको,
रंज कोई ना होता, गर कहने वाला हमदम ना होता।
तुम अब हो मुझसे दूर, ये चलो है हमको मंजूर,
चाहता है दिल तुझको, इसमें मेरा क्या कसूर।
जमीं फ़लक से मिलना चाहे ये है सिर्फ उसका भरम,
जमीं तो हमेशा तरसी है पाने को अब्र के रहमों करम।

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