Saturday, July 6, 2019

#अनकही_स्मृतियाँ


मौजे-सैलाब थमने सी लगी है, 
साहिलों पे कश्तियाँ मिलने लगी है,
हर सूं तेरी महक सी आती है,
मेरी साँसे तेरी साँसों में बहक जाती है।

मेरी सुबह भी होती है तेरे तसव्वुर में,
और शाम भी ढलती है आसे-दीदार में,
मेरी आँखों में ठहरती हुई ये कारी बदली,
रह रह कर बरसती है मेरे ज़हन में।

आता हूँगा मैं तेरे ख्वाबों ख्यालों में,
महसूस करती होगी तू अकेली मेलों में,
खोजती होंगी तेरी बेसब्र निगाहें,
पाने को दीदार मेरा अजनबी चहेरों में।

कभी कसमासाती तो तू भी होगी ख्वाबों में,
तड़पती होंगी समेंटने को मुझको बाहों में,
दरिया की मानिंद बह जाता हूँगा में,
छोड़ के कश्ती को तेरी मौजें ख्वाबों में।

बेपरवाह है तू अब ज़माने के हर फसाने से,
पूछा मेरा मिज़ाज तूने हर पहचाहन वालों से,
खोजती हुई तू चली आई है इस शहर,
समझकर इश्क को अपनी ज़िन्दगी का मुक़द्दर।

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