तेरी उल्फत की निशानियाँ पे ही बन रहा था मेरा यह घरौंदा,
जालिम ने मांगकर उन बुतों को सुपुर्दे खाक कर दिया बुतकदा।
थमते हुए दिल में है ठहरा एक समुन्दर गहरा
चाँद भी पा गया है कोई आशना कोई दूसरा।
यूँ जा रहे हो, जैसे लौट कर अब कभी ना आओगे,
तन्हा जब होगे रहबरे रहगुज़र हम ही को पाओगे।
रेज़ा रेज़ा दिल है बिखरता जैसै पतझड़ पत्ता पत्ता है टूटता,
माझी थे जो उन्होंने ही डुबो दी कश्ती अश्कों के सैलाब में।
फिजाओं ने भी है मुंह मोड़ा जबसे तुमने मझधार बीच हाथ है छोड़ा,
फिजाओं संग तेरी रवानी से क्यूँ नहीं हैरानी है अपनी परेशानी से।

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