Sunday, June 30, 2019

#अनकही_स्मृतियाँ

इश्क मासूमियत औ शरारत है, मरियम औ राधा की मूरत है,
ये नज्मे ख़ास है और मौसम ए हिज्राँ में चिराग़े हिदायत है। 

दिल में बेकरारी सी है उठी जब दोपहर शाम के पहलू में है ढली,
शोला दहका बेखुदे दिल जब आफताब छिपा फ़लक के आगोश में। 

हर सू तेरे आने की आहट है उठी कहरे आफ़ताब जमीं पिघली है अभी,
बहती हवा को ठहरने दीजिये उनके तरन्नुम को लफ्जों में सजने दीजिये। 

इस उठती हुई मौजे मस्ती में, रेज़ा रेज़ा टूटकर उनको बिखरने दीजिये,
घने स्याह बालों की छांव में बादलों को टकराकर बरसने दीजिये। 

शिद्दत से वो लम्हा रूह में है बसा इसरारे जिस्म जब आगोश में है पिघला,
करते है इज़हार प्यार का हम खो जाते है कितने छिपे हुए मयखानों में हम। 

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