हवाओं की सरसराहाट में किया था महसूस उनका हौले-हौले आना,
फिजाओं में खोजा था उनके चेहरे को हया से सुर्ख लाल हो जाना।
बेखबर थे हम सितमगर के अंदाज़े ए सितम से,
डूब गए दरिया ए अश्क में माजी की रवानगी से।
डूब गए दरिया ए अश्क में माजी की रवानगी से।
वो हौले-हौले मेरी साँसों को महका गया,
पल-पल मेरे वजूद में समाता चला गया,
पल-पल मेरे वजूद में समाता चला गया,
अक्स उनका है डूबता मेरे चश्म ए तर में,
खोते जाते है हम उनके पेच ओ ख़म में।
उनको पाने की एक कसक थी अजीब,
हर अज़ीज़ आज लगने लगा था रकीब,
होने लगी है ख्वाबों ख्वाहिशों की तावीर,
मिलने लगी निगाहों को इश्क की तासीर।
सजने लगी है ख्वाबों ख्यालों की महफिले,
होने लगी है बेतकल्लुफ वो जब से हम से,
होते हुए हम बेखुद उन बांकी अदाओं में,
कर न सके बयाँ हाल ए दिल हम उनसे।

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