Sunday, June 30, 2019

#अनकही_स्मृतियाँ


लफ्ज़ है थम जाते मेरे होठों पर आके, 
उनकी गरम गरम साँसों का एहसास पाके,
दिल है मचलता ताबिश से सुकून पाने को, 
इन जुल्फों के घने साए में पनाह पाने को। 


इश्क न एक फ़रियाद है, नाही मोहताज है इंतज़ार का,
कृष्ण की बांसुरी से निकला, ये एक राग है इज़हार का। 


इश्क ए जूनून में एक सादगी है, मीरा की पाक बन्दगी है,
पशेजुल्मत दीदारे सूरदास है, बेजुबान गायों का आलाप है। 

चाहत है अब पाने को आब की, परवाह नहीं अपनी साख की,
हो जाती है ख़ाके दरिया, पाने को मौजे सैलाब ए सागर की। 

बैचैनियाँ है इस कदर, जैसे साहिलों पर कश्तियाँ है बेसब्र,
मौजे मस्ती की आस में, डूब जाती है सैलाबों के न कयास में। 

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