तेरे भेजे हर ख़त में, एक अख्श निहारता हूँ,
और देखकर उसको, उसपे ही मर जाता हूँ।
हर उठती हुई आहट में तेरी आती सी सदायें है,
तेरी कुशादगी ही तो आज मेरी बनी सज़ाएँ है।
कुछ रिश्ते जुड़ से जाते है जो टूटने पर करते है आवाज़,
उन रिश्तों को कैसे जोड़ू, जो टूटने पर नहीं करते है आवाज।
तुम नहीं, ना है तेरा वो एहसास, नाहीं है वो अब समां,
साथ अब मेरे है मेरी जुस्तजू और कुछ बीते हुए लम्हा।
जिन्दगी खीचकर मुझको, कुछ ऐसे मुकाम पर है ले आई,
जहां बीते लम्हों को जोड़के, मैंने तेरी यादों की तस्बीह है बनाई।
थी मेरी जुर्रत साहिल को पाने की, सैलाबों में कश्ती को पार लगाने की,
वोह क्या जाने इश्क है क्या, जिन्होंने किनारों पर ही है सफ़र किया।
वो एक लम्हां तो मुझे याद है,
तुझे याद है कि नहीं मुझे नहीं पता,
वो तेरा पलके उठाकर जानिब,
फिर गिरा लेना आज भी दिल में है चुभता,
वो तेरी मासूम सी निगाहों का,
बैचनियों से ढूढ़ना मुझको है नहीं भूलता,
वो एक लम्हां तो मुझे याद है,
तुझे याद है कि नहीं मुझे नहीं पता।

अतिसुन्दर सर!
ReplyDeleteधन्यवाद
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